Wednesday, 6 July 2011

आज के प्रेमियों के कारण कवियों की नसबंदी


प्रि, हीर
आशा है कि तुम कु्शल होगी

प्रिय एक अर्से के बाद पत्र लिख रहा हूँ। आज तुम्हारी बहुत याद रही है,क्या तुम्हे पता है? आज लोग वेलेन्टाईन डे मना रहे हैं। हमारे दे्श में यह एक नया अंग्रेजी जुगाड़ आया है, प्रेम का इजहार करने के लिए। कोई नैन मट्टके की जरुरत नही है, डायरेक्ट कान्ट्रेक्ट है। पहले तो पहल सिर्फ़ लड़कों की तरफ़ से होती थी, अब लड़के-लड़की दोनो ही प्रेम का इजहार कर सकते है। पहले सफ़ेद गुलाब पेश किया जाता है,फ़िर पीला गुलाब, जब दोनो कबु्ल हो गए तो झट से लाल गुलाब थमा दिया जाता है, या फ़िर कोई तो सीधे ही लाल पर जाता है, समय गंवाने की जरुरत नही। फ़टाफ़ट प्रेम कबुल हुआ फ़िर तैयार है झमा-झम करती बाईक, लांग ड्राईव के लिए। दो बार की लांग ड्राईव से बाईक का दम निकल जाता है और सवार का भी. फुल भी मुरझा जाता है. फिर से यही फ़ूल बनाने प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है. तुम्हारे-हमारे प्रेम की तरह अब कुछ भी टिकाऊ नहीं है. सब कुछ नकली है.

याद करो जब तुम और हम पहली बार जब हम स्कुल में आमने सामने हुए थे. एक प्रेम की चिंगारी हमारे दिल में फूटी थी. जिसकी लपट को हमारे हिंदी के गुरूजी ने अपने अंतर चक्षुओं से देख लिया था, कामायनी पढ़ाते हुए कहा था कि "घटायें उमड़-घुमड़ कर रही हैं. बिजली चमक रही है, आग दोनों तरफ बराबर लगी हुयी है. बस बरसात होनी बाकी है". उस समय तक हमें पता ही नहीं था कि यही प्रेम होता हैइसका खुलासा तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध से हुआ था. क्या जमाना था वह? बिना प्रेम प्रकटन के ही प्रकट हो जाता था. मित्रों को भी पता चल जाता था. कहीं तो कुछ है। जब हम दिन में कई बार जुल्फें संवारते थे.

प्रेम-पत्र लिखना भी एक कला होती थी. रात-रात भर जाग कर पत्र का मसौदा तैयार करते थे. फिर उसे कई बार पढ़ते थे. किसी बोर्ड परीक्षा से भी बढ़कर यह परीक्षा होती थीसबसे जोखिम भरा काम होता था उन्हें तुम्हारे तक पहुँचाना. जिसमे जान जाने का खतरा भी था. शायद हमारे ज़माने में इसीलिए प्रेमियों को जांबाज कहा जाता था. बड़ी तिकड़म लगानी पड़ती थी एक पत्र को पहुँचाने में.याद है तुम्हे एक बार चुन्नू के हाथों भेजा गया पत्र तुम्हारी भाभी के हाथ लग गया था और बात तुम्हारे पिताजी तक पहुँच गई थी. फ़िर क्या सुपर रिन से तुम्हारी धुलाई हुई थी कि आज तक चमक नही गई होगी। वह समय जिन्दगी का सबसे मुस्किल समय था.

हमें भी फौजी पिता से पिटने का डर और तुम्हारे भी पिता को भी हमारे पिता की बन्दुक का डर, मामला बड़ा फँस गया था. बस तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारे ब्याह करने की ठान ली.तुम्हारा ब्याह हो गया और तुम्हारे पिताजी ने चैन की साँस ली. वे एक दिन मुझे मिले थे और मेरा हाल-चाल और कमाई-धमाई पूछी थी. तो मैंने कहा था कि अब क्या करोगे पूछ करमर्द की कमाई, औरत की उमर और रायल इन्फ़ील्ड मोटर सायकिल की एवरेज पूछने वाला मुरख ही होता है.

पुराने तरीके सब समाप्त हो गये.आज कल मोबाईल ईंटरनेट का चलन हो गया है, कब प्रेम का इजहार होता है और कब प्रेम टूटता है पता ही नहीं चलता. बस एक एस.एम.एस और फिर वह हो जाता है बेस्ट फ्रेंड. रक्षा बन्धन की तरह फ्रेंड बैंड (मित्र सुत्र)भी गए है. जो एक दोस्त दुसरे दोस्त को पहनाता है, मतलब जिसके हाथ में मित्र-सूत्र दिखे समझ लो वह बुक हो गया है. मुंह पर रुमाल बांध कर कहीं भी हो आते हैं घर वालों को पता ही नहीं चलता. बस सब दोस्ती-दोस्ती की आड़ में हो चल जाता है. कितना जमाना बदल गया है ना?

कहने का तात्पर्य यह है कि अब इस तरह के हाई टेक प्रेम में वो मजा नहीं रहा. जो अपने समय में होता था. प्रेमलाप भी नजाकत और नफासत से होता था. तारे गिनने की कहानियां होती थी, प्रेम ग्रन्थ रचे जाते थे. नायिका और नायक की कहानी ही गायब हो गयी. तोता-मैना की कहानी की तो क्या बात करें? वो साँप से बल खाते कुंतल और कानों में झूमते झुमके बरेली के बाजार में खोने के बाद मिले ही नहीं हैंविछोह में अब वो तडफ कहाँ, जो एक अग्नि दिल में सुलगाये रहती थी. जिसने तुलसी को कवि तुलसी दास बनाया.

तुम्हारे विवाहोपरांत विछोह ने हमें पागल कर दिया (आधे तो पहले ही थी,अन्यथा इस पचड़े में क्यों पड़ते?) कवि दुष्यंत कुमार ने कहा है " गमे जानां गमे दौरां गमे हस्ती गमे ईश्क, जब गम-गम ही दिल मे भरा होतो गजल होती है।" बस फ़िर क्या था, तुम्हारे विवाहोपरांत एक नए कवि का जन्म हुआ.हम कवि वियोगी हो गए तथा कागजों का मुंह काला करना शुरू कर दियासंयोग के सपने और वियोग का यथार्थ दिन-रात कागजों में उतारा. बस यही एक काम रह गया था, जीवन में हमारे। हो गए स्थापित कवि जो हम कभी विस्थापित थे।

अब तो मैं देखता हुँ कि हमारे जैसे समर्पित प्रेमियों का टोटा ही पड़ गया है। हमारी चाहे असफ़ल प्रेम कहानी ही क्यों ना हो जीवन भर सीने से लगाए घुमते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से लगाये फिरती हैअब नये कवि भी पैदा होने बंद हो गए शायद फैक्ट्री ही बंद हो गई. वही पुराने खूसट कवि, जिनके मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं मंचो से प्रेम गीत गाते मिल जाते हैं .यह वेलेंटाईन डे तो नए कवियों के लिए नसबंदी जैसा शासकीय प्रोग्राम हो गया. ना प्रेम की आग जल रही है ना कवियों का जन्म हो रहा है. इससे कविता के अस्तित्व को बहुत बड़ा खतरा हो गया है. पहले की प्रेमिकाएं भी कविता एवं शेर--शायरी की समझ रखती थी. लेकिन आज कल तो सिर्फ पैसा-पैसा. एक दिल जले ने इस सत्यता को उजागर करते हुए एक गाना ही लिख दिया " तू पैसा-पैसा करती है तू पैसे पे क्यों मरती है, एक बात मुझे बतला दे तू उस रब से क्यों नहीं डरती है". आज भी तुम्हारी यादें इस दिल में संजोये हुए जीवन के सफ़र में चल रहे हैंये तुम्हारी याद है गोया लक्ष्मण सिल्वेनिया का बल्ब जो बुझता ही नहीं है. लगता है जीवन भर की गारंटी है.

और तुम्हारे पति देव कैसे हैं? उनके और अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना, सुना है, बहुत मोटी हो गयी हो. शुगर भी तुम्हारी बढ़ी रहती है. जरा पैदल चले करो, हफ्ते में एक बार शुगर बी.पी. नपवा लिए करो, तुम्हारे नाती-पोतों को प्यार और तुम्हे वेलेंन्टाईन डे और मदनोत्सव पर ढेर सारा प्यार,

एक मुक्तक अर्ज किया है.

आरजू लिए फिरते रहे उनको पाने की

हम हवा का रुख देखते रहे ज़माने की

सारी तमन्नाएं धरी की धरी रह गयी

अब घडी ही गयी जनाजा उठाने की


तुम्हारा

तुम्हारा रांझा

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