Thursday, 22 September 2011

मेरे अश्को का कोई अंत नहीं


आसमान  भी  बरस  रहा  हैं,
मेरे  अश्को  से  टकरा  रहा  हैं,
किसमे हैं  जोर  ज्यादा  शायद  यह  देख  रहा  हैं,
बरसात  तो  फिर  भी  रुक  जाएगी,
मेरे  अश्को  का  कोई  अंत  नहीं,
दिल  में  हैं  दर्द  इतने  जिसका  कोई  हिसाब  नहीं …


















जख्म महोब्बत के पुराने नहीं

अंगूर की बेटी के जो दीवाने नहीं
वो लोग महफ़िल में बुलाने नहीं

कल के टूटते आज ही टूट जाएँ
झूठे रिश्ते नाते हमें निभाने नहीं

जिंदगी का नशा वो क्या जाने
जिसने उठाकर देखें पैमाने नही 

समझ सकता हूँ कजरारी आँखें
इनसे बढ़कर कहीं मयखाने नही 

इतना तो तय है सितमगर के
साँझ ढलते ही ख्वाब आने नहीं

कल का ही तो वाक्यात है बेचैन
जख्म महोब्बत के पुराने नहीं